दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

धरा धधकती तपन से, है सूरज अंगार।
त्राहि – त्राहि अब मच रही, बिन पानी संसार।

ताल पोखर सूख गये, बिलख गये सब जान
हरितिमा सब झुलस रहे, गर्मी बना उफान।

देखो कलियुग चल रहा, काग हंस की चाल
टूट रहा ऐसा कहर, बद से बदतर हाल।

माया के इस जाल में, रखो फूंककर पाँव
चहुँ दिश कड़वी घूप है ,उनमें खोजो छाँव।

मानव तन अनमोल है, सोच समझ कर बोल
कर्म करो अच्छा भला, रहे बराबर तोल।

बीते बचपन खेल में, गये जवानी हार
बूढ़ बैठ कर रो रहे, यह जीवन का सार।

दो दिल देखो मिल रहे, आँख बने अंगार
ऐसा ही अब लग रहा, कलियुग में ब्यापार।

5 Comments

  1. mukta mukta 20/05/2018
  2. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 20/05/2018
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/05/2018
  4. C.M. Sharma C.M. Sharma 21/05/2018
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/05/2018

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