दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

घटता – बढ़ता चाँद है, बहुत अजब है खेल
साथ सूर्य अरु चाँद का, होता कभी न मेल।

नदियाँ कल – कल बड़ीह रही, झरने गाते गीत
घूंघट ओढ़े ताल भी- , ढूंढ रहा मन मीत।

राम लखन माँ जानकी, जय जय जय हनुमान
यही मंत्र भगवान का, कर देता उत्थान।

धन दौलत जाती नहीं, खाली रहता हाथ
फिर भी इनकी लालसा, रहे सभी के साथ ।

कूप सूख सारे गये, फूट गया तकदीर
दर्शन दुर्लभ हो गये, निर्मल मीठा नीर।

हितकारी है सच सदा, लाचारी है झूठ
इतना झूठा मत बनो, कर दे जीवन ठूठ ।

समय – समय का फेर में, लगे नहीं अब टेर
बोया पेड़ बबूल का, कहाँ से आए बेर।

मजदूरी मजदूर की, देता अब है कौन
उनकी हालत देख कर, रह जाते सब मौन।

ऐ मानव करना नहीं, अफवाहों की बात
उल्टी सीधी हरकतें, कर देता है घात।

सदा सहायक बन रहे, अपने मीठे बोल
जैसी करनी आप की, वैसी उनकी मोल।

मन में धीरज जो रखे, उनके मंगल काज
जो खोता विश्वास है, अटके – भटके आज।

6 Comments

  1. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 19/05/2018
  2. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 19/05/2018
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/05/2018
  4. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 20/05/2018
  5. C.M. Sharma C.M. Sharma 21/05/2018
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/05/2018

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