राक्षस की जीभ

पेड़ों के झुरमुट से झांकती
मीलों से अपना विकास आंकती
शहर से कस्बे , कस्बे से गाँव तक
मानव की यह रचना अजीब।।
यह काली कोलतार की जीभ।।

राह राही की मंजिल का।
रूप कहीं एकाकीपन का।
तो कहीं सुकुमार पहाड़ी पर चढ़ती।
एक-अनेक धारा में बहती ।
मानव की यह रचना अजीब ।।
यह काली कोलतार की जीभ ।।

वाहनों की भागम-भाग कहीं
कहीं भीड़ की रेलमपेल
कोई इस पर डर-डर चलता
तो कोई समझता छोटा सा खेल
भाव के अनुरूप खेल दिखाती
मानव की यह रचना अजीब ।।
यह काली कोलतार की जीभ ।।

कभी सपनों के फूलों से लदी
कभी मौत के पतझड़ सी
नियमों में बंधी,रोशनियों से सजी
मानव की यह रचना अजीब ।।
यह काली कोलतार की जीभ ।।
।।मुक्ता शर्मा ।।

20 Comments

  1. Vimal Kumar Shukla Vimal Kumar Shukla 17/05/2018
    • mukta mukta 19/05/2018
  2. rakesh kumar Rakesh kumar 18/05/2018
    • mukta mukta 19/05/2018
  3. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 18/05/2018
    • mukta mukta 19/05/2018
  4. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 18/05/2018
    • mukta mukta 19/05/2018
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 18/05/2018
    • mukta mukta 19/05/2018
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 18/05/2018
    • mukta mukta 19/05/2018
  7. Abhishek Rajhans 18/05/2018
    • mukta mukta 19/05/2018
  8. C.M. Sharma C.M. Sharma 19/05/2018
    • mukta mukta 19/05/2018
  9. davendra87 davendra87 19/05/2018
    • mukta mukta 19/05/2018
  10. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 20/05/2018
  11. mukta mukta 21/05/2018

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