गदाए इश्क …. Bindeshwar Prasad Sharma (Bindu)

गदा ए इश्क के कासे में अब थोड़ी सी रहम की भीख तो ड़ाल दे
वारफ्तगी में फंसा हूॅं घायल मेरे सीने से तीर तो निकाल दे।

न कत्ल तुम कर तेग-ए-सितम से वो मेरे जीने की ये आरजू
सख्ती कसाने इश्क ओ साइल पर अब और न कोई सवाल दे।

तुम्हारी सर्भगी दीद और तुम्हारे गेसुओं के शायक हम भी थे कभी
इक शिकस्ता.ओ मुन्तशिर बन गया अब और न कोई मलाल दे।

मेरे खोये हुए इशरत-ए-रफ्ता मेरे आशनाई अब मुझे लौटा दो
ताबे-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त मेरे हमदम इल्फात-ए-अहवाल दे।

बहुत फेरे लगाये आस्तान-ए-यार की सह लिए जौर-ए-जफा
रह गया महरूम वफ़ाए इश्क से बस अब हाथ में करताल दे।

बे तकल्लूफ में हम जी रहे थे अब तलक अपने नसीब लेकर
बदल अपने खिसाल-ए-सरिश्ते मिजाज अब मुझे इतिसाल दे।

अब कहॉ वो सब्र-ओ तहम्मुक वो मेरे जज्बात-ए-जुस्तजू
मेरे जराहते-दिल में सख्ती-कसाने-इश्क तो मोमिसाल दे।

दिल-ए.रंजूर कबतलक तड़पेगा गाफिल-ए-पागलों की तरह
उलझकर रह गई है जिंदगी इस कदर अब न खिसाल दे।

4 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/05/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 16/05/2018
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 16/05/2018
  4. rakesh kumar Rakesh kumar 17/05/2018

Leave a Reply