माँस इंसान का

भारतीय संस्कृति की सरेआम

बोली लगा रहा है

अपनी पत्नी की लाश उठाकर

वो कंधे पर ले जा रहा है

इंसानो की बस्ती में

चार इंसान भले नहीं

उठावनी में उसकी

चार कंधे भी मिले नहीं

वो भूखा है सुबह से

तंगहाली से अकड़ा हुआ

नौचा है जी भरकर सबने

अस्पताल की बैंच पर पड़ा हुआ

बिल भी उसने भरे नहीं

बस आँखे भर भर आती हैं

ये गरीबी देखो कैसे

जिंदा इंसान खाती है

मरने से पहले फूँक दिया

जीवन उस नादान का

देखो कैसे तिजोरियों में बन्ध

बिकता है माँस इंसान का

2 Comments

  1. Dr Swati Gupta Dr Swati Gupta 10/05/2018
  2. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 10/05/2018

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