आईना – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

आदमी गाँव का था, शहर सा बन गया
मीठी – मीठी बातें, जहर सा बन गया।

मुमकिन नहीं था, ऐसे बदल जायेंगे
आज वही आदमी, कहर सा बन गया।

कभी समाज के लिए, आईना था वह
आतंक फैलाकर वह, खबर सा बन गया।

बुरी संगत ऊँचाई तो दे दी उसे
कानून हाथ लेकर मगर सा बन गया।

नैतिकता भूल रहा क्यों आज आदमी
स्तर गिराकर अपना, गटर सा बन गया।

दंग बिन्दु खामोश है, इन्हें देखकर
कलम बोलती है, किन्तु डर सा बन गया।

5 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 26/04/2018
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 26/04/2018
  3. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 26/04/2018
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 26/04/2018
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/04/2018

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