विकास – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

गरीब जहाँ था, वहीं खड़ा है
शोषण कर रहा, वही बड़ा है।
जिसने भी आवाज उठाई
जान भी देने को, अड़ा है।
फिर गरीब किसान ही मरता
मजदूर क्या-क्या न करता।
बे कसूर है, सो मर जाता
सीने में गोली है खाता।
मसीहा कौन बनेगा इनका
नेता का दिमाग है खिसका।
लोग सरकारी , बड़े निराले
कुछ उजले हैं, फिर कुछ काले।
कुछ नेता, अपराधी बन गए
दबंग चोर, सिपाही बन गए।
नटबरलाल, कुछ बैंक उजाड़े
नेता बने, तिजोरी झाड़े।
मन मानी, करते हैं ऐसा
लोकतंत्र भी, है यह कैसा।
राहत जो मिलती है इनको
पहुँच नहीं पाता है पैसा।
जो अच्छे हैं, करते अच्छे
कुछ तो हैं, इनमें भी सच्चे।
है संघर्ष, जीवन ही सबका
साथ रहे, विकास हो सबका।

7 Comments

  1. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 22/04/2018
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 22/04/2018
  3. davendra87 davendra87 23/04/2018
  4. pratik 23/04/2018
  5. C.M. Sharma C.M. Sharma 23/04/2018
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 23/04/2018
  7. Madhu tiwari Madhu tiwari 23/04/2018

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