मैं माँ केवल माँ

।। मैं माँ केवल माँ ।।
भरी दोपहरी तपती गर्मी में पसीना बहाती ।
महल नहीं तो कुटिया की ही छाँव देना चाहती ।
तार-तार चीथड़ों से लाल को लू से बचाती ।
खुदा की प्यास भूल,सपनों के पतंग उड़ाती ।
मैं माँ केवल माँ ।।
निर्लज शराबी पति का सोच दिल धड़काती ।
क्या समेटूं क्या खरीदूं?यही सोच सताती ।
बिन थके पत्थरों पर चोट लगाते जाती ।
मैं माँ केवल माँ ।।
चलती हथौड़े की हत्थी शायद ढाढस थी बंधाती ।
कोमल तो है कमजोर नहीं यही याद दिलाती ।
फिर कुछ सोच पत्थर दिल के लिए आँसू बहाती ।
पत्थर तोड़ना सरल पर वही दिल कैसे पिघलाती ?
ढीठ फिर लाल के उज्जवल भविष्य के स्वप्न सजाती ।
मैं माँ केवल माँ ।।
।।मुक्ता शर्मा ।।

10 Comments

  1. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 16/04/2018
    • mukta mukta 16/04/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 17/04/2018
    • mukta mukta 18/04/2018
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 17/04/2018
    • mukta mukta 18/04/2018
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 18/04/2018
    • mukta mukta 18/04/2018
  5. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 19/04/2018
    • mukta mukta 19/04/2018

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