अल्फ़ाज़

बेशक मुझे दो अपने इश्क़ का नज़राना
मगर चाहिए उसमे इश्क़ नजर आना

भरी महफ़िल में कैसे ना कर देते
अमानत तुम्हारी खुद आकर देते

लौट जा,और देर यहां रह मत
नही इस दर पर खुदा की रहमत

देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/04/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 17/04/2018
  3. davendra87 davendra87 17/04/2018
    • C.M. Sharma C.M. Sharma 17/04/2018
  4. davendra87 davendra87 17/04/2018

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