तुम्हारे सेवा निवृत्त होने पर

लंबी यात्रा के बाद
आता है तुम्हारा पड़ाव
तुम्हें उतारते हुए
तुम्हें सौंपता हूँ
तुम्हारे पंख
दिगंत आकाश
तुम्हारे सपने
स्मरण करवाता हूँ तुम्हें
तुम्हारा ठौर-ठिकाना
आकाश के नीचे
पृथ्वी के छोर तक
तुम्हारे साम्राज्य जैसा
तुम्हारा नाम

उतरने की हड़बड़ी में
तुम अपनी भूल गए थे
तुम्हें तुम्हारा समय सौंपते हुए
अपने लिए चुरा लेता हूँ कुछ क्षण
सहेज कर रखता हूँ उन्हें
मोरपंख की तरह
किताब के दो पन्नों के बीच।

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