मेरे गीतों को वर दे

मेरे गीतों को वर दे
हर अक्षर में सुर भर दे।

चलता था जिस पथरेखा पर
वो भी लुप्त हो चली नयन से
अब राही क्या बन पाऊँगा
मिट जाऊँगा कंकण कण में

निज अस्तित्व बना रखने ही
पड़ा रहूँ मैं तेरे दर पे
मेरे गीतों को वर दे
हर अक्षर में सुर भर दे।

फटा-पुराना तन है मेरा
ये वस्त्र कभी के तार हुए
जीवन है इक जीर्ण कफन-सा
जिसे ओढ़ हम बेकार हुए

अब जो चेतनता है मुझमें
उसमें ही अब कुछ लय भर दे
मेरे गीतों को वर दे
हर अक्षर में सुर भर दे।

घट भरने के पहले तूने
जीवन-संध्या काजल दे दी
पथ चलने की चाहत देने
विरह-ताप की पायल दे दी

अपने अनंत जलस्त्रोतों से
खाली घट ये थोड़ा भर दे
मेरे गीतों को वर दे
हर अक्षर में सुर भर दे।

विकल हुआ हूँ, काँप रहा हूँ
देवालय से दूर पड़ा हूँ
करूँ प्रार्थना कैसे अब मैं
बोल सभी मैं भूल गया हूँ

विवश, व्यथित, लाचार, व्यर्थ हूँ
हर इच्छा अब नश्वर कर दे
मेरे गीतों को वर दे
हर अक्षर में सुर भर दे।

तड़प रहा क्यूँ यह खग प्यारा
यूँ विषय-जाल में बिंघा हुआ
क्यूँ प्रकाश के पर छितराकर
है अंधकार में घिरा हुआ

मेरे गीतों को मुखरित कर
क्षणभर तो उजियारा कर दे
मेरे गीतों को वर दे
हर अक्षर में सुर भर दे।

…. भूपेन्द्र कुमार दवे
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4 Comments

  1. davendra87 davendra87 12/04/2018
    • bhupendradave 12/04/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 17/04/2018

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