तुम थी और मैं भी

शीर्षक–तुम थी और मैं भी

ये वक़्त है जो कुछ याद रहने नहीं देता
ऒफ़िस की फाइल ढूंढते -ढूंढते
ढूंड लिया था
वो बंद शीशे का ताजमहल
और फिर
सब कुछ भूल कर
खो गया उन यादो में
जिसमे तुम थी और भी

मैं सोलह का था
और तुम शायद पंद्रह की रही होगी
मैं हर रोज तुम्हारे घर के पास आकर
साइकिल की घंटी बजाता था
और तुम छत पर आकर
खिलखिला उठती थी
तुम मेरी आदत थी
और मैं तुम्हारी जरुरत
उन लम्हों में
तुम थी और मैं भी

तुम्हे शायद याद नहीं होगा
जब तुम्हे किसी और के साथ देखता
मेरे अन्दर आग सी लग जाती थी
तुम्हे भी तो मेरा
किसी और लड़की के पास
जाना पसंद नहीं था
तुम्हारा साथ होना
सुकून देता था मुझे
मेरा साथ होना महका देता था तुम्हे
उन अहसासों में
तुम थी और मैं भी

तुम्हे तो ये भी नहीं पता
जब तुम होती थी
तो कुछ और देख नहीं पाता था
तुम्हारी नजर को भी
मेरा पता मालूम होता था
काश ये वक़्त यार होता मेरा
तो मैं लौट जाता पीछे
और कह देता मैं तुमसे
तुम मेरा प्यार थी और मैं भी —अभिषेक राजहंस

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/04/2018
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/04/2018
  3. chandramohan kisku Chandramohan Kisku 10/04/2018

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