वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी

वो झोपड़ी में खाँसता था झोपड़ी हिलती थी
फुटपाथ पर वही आ गया तो धरती हिलती थी।

मेरा नाम आया तो उनकी जुबाँ कँपती थी
जाम कँपते थे, सुराही में मैकशी हिलती थी।

कल भी आया चाँद कुछ वैसी ही चाँदनी लिये
जो नमपलकों को सहलाती चूमती हिलती थी।

घर नया था, हर दरो-दीवार नई नई थी
पर यादों में चरमराती इक खिड़की हिलती थी।

माना कि जिन्दगी गजल की कच्ची किताब थी
खामोश लबों पर फिर भी हर शायरी हिलती थी।
….. भूपेन्द्र कुमार दवे
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12 Comments

  1. chandramohan kisku Chandramohan Kisku 09/04/2018
    • bhupendradave 09/04/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 09/04/2018
    • bhupendradave 09/04/2018
  3. davendra87 davendra87 09/04/2018
    • bhupendradave 09/04/2018
  4. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 09/04/2018
    • bhupendradave 09/04/2018
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 09/04/2018
  6. bhupendradave 09/04/2018
    • डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/04/2018
      • bhupendradave 10/04/2018

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