अन्तर्मन

छुपी असंख्य तहों के भीतर ,
मन की दुनिया अंतरंग मे ,
देख नहीं पता तू उसको ,
भटक रहा क्यो बहिरंग में ,
ध्वनि आत्मा की क्षीण सही ,
पर सच्ची बात बताती है,
कर ले शांत विकारों को तू,
दिल की आवाज़ बुलाती है ,
ढूंढ रहा है बाहर किसको तू ,
हर आनंद है स्व मन में ,
झरना बहता है खुशियों का ,
उद्गम जिसका अन्तर्मन में …………..सीमा “अपराजिता “

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