अपराजिता (06.01.2018)

हो रही है पराजित ये अपराजिता,
जल रही है इसके अरमानो की चिता,
हर दर्द जीतने को बेताब हो रहा है,
हर सपना जैसे ख्वाब हो रहा है,
मुस्कान होठों से दूर हो गई है,
हर खुशी ग़म के आगे मजबूर हो गई है,
करके अर्पण खुद को कहलाएगी “अर्पिता”,
बह उठेगी एक रोज विचारों की सरिता,
तब होगा इस पर संसार “गर्विता”
और फिर से जीत जाएगी “अपराजिता”

सीमा वर्मा”अपराजिता”

6 Comments

  1. chandramohan kisku Chandramohan Kisku 07/04/2018
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2018
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/04/2018
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 07/04/2018
  5. C.M. Sharma C.M. Sharma 09/04/2018
  6. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 09/04/2018

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