चरखा घूम रहा है

तेरी हस्ती ने छुआ है या तेरे जज्बातों से वाबस्ता है  ,कैसे कहूँ  ?
 मुझे तेरा इश्क सुहाता तो है पर शिद्दत ए एहसास जगाता नही ||
  कभी कारवां बदल लिया कभी चाल  , मंजिल का क्या कहूँ ?
ये हौसला मेरा, ख्वाहिशो को जिन्दा रखता तो है पर कदमो को उड़ान देता नही ||
दर्द से  कुछ यूँ वाकिफ रहा,मेरी आवाज़ का मैं ही कातिल रहा ,सादगी  का क्या कहूँ ?
 रूह की सिलवटे उम्र की ओट में छुपाता तो हु ,पर लिबास उसे पहनाता नही
दरख़्त ए सहरा सी हो गयी हैं  जिंदगी , मैं जिन्दा हु कि नही ,ये मैं कैसे कहूँ ?
ये ज़िन्दगी का चरखा मेरा घूमता तो है ,पर मेरे किरदार को ये फलसफा कोई देता नही ||

3 Comments

  1. chandramohan kisku Chandramohan Kisku 07/04/2018
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 07/04/2018

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