दोगलापन (अपराजिता)

क्यों खड़े हो जाते हो
मेरे सम्मुख
अपनत्व का मुखौटा ओढ़े
तारीफों के पुल बांधते
झूठी तारीफों के पुल
जिनके पार तुम्हारी
अनगिनत अतृप्त
आकांक्षाएं
मेरा परिहास करती सी
मेरे अस्तित्व पर
प्रश्नचिन्ह लगाती ।।

क्यों खड़े हो जाते हो
मेरे सम्मुख
प्रेम की व्याख्या लिए
जिन पर तुम स्वयं
खरे नही उतरते
थोपना चाहते हो
झूठ और फरेब में डूबे
सम्मान के लुभावने शब्द
जिनमे केवल शोर है
संगीत नही ।।

क्यों खड़े हो जाते हो
मेरे सम्मुख
मर्यादा और परंपराओं की
दीवार लिए
जिनकी ओट में
छिप जाती है
तुम्हारी दुर्बलता
तुम्हारा असंयम,
तुम्हारा अभिमान
मुझे पाने की
तुम्हारी अभिलाषा
निचोड़ लेती है
मेरा बूंद बूंद रक्त
क्षत विक्षत
मेरी आत्मा के
अनेकों रिसते घाव
तुम्हे दिखाई नही देते।।

क्यों खड़े हो जाते हो
मेरे सम्मुख
सहानुभूति और
संवेदनाओं के
पुष्प लिए
जिनमे मात्र
आकर्षण है रंगों का
सुगंध नही है
समर्पण की
पाना चाहते हो
स्पर्श करना चाहते हो
पर दम तोड़ देते हैं
तुम्हारे सारे प्रयत्न
देह की चौखट पर ही
छू नही पाते हो
कभी हृदय को
जान नही पाते हो
अंतर्मन को,
देख नही पाते हो
मेरा अनुपम सौंदर्य
अद्भुत श्रृंगार,
जो सिर्फ तुम्हारे लिए है ।।

क्यों खड़े हो जाते हो
मेरे सम्मुख
पाश्चाताप और
आत्मग्लानि के अश्रु लिए
जो छलक उठते है
हर बार
मेरे विध्वंस के बाद
तुम्हारी आँखों से,
बढ़ जाती है
मेरी वेदना
मेरी पीड़ा
कई गुना
तुम्हे इस तरह
पराजित,
लज्जित देख
आखिर मैं ही तो हूँ
तुम्हारी शक्ति
तुम्हारा सौंदर्य
किंतु मेरे अस्तित्व
पर तुम्हारा
यह मौन
स्वयं पतन
है तुम्हारा
और कारण है
मेरी पीड़ा
मेरी वेदना
मेरे दुखों का
मैं “अपराजिता”
पराजित हूँ
तुम्हारे झूठ से,
दोगलेपन से ।।

देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

6 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 03/04/2018
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 03/04/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 04/04/2018
  4. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 04/04/2018
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 05/04/2018
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 05/04/2018

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