31 जुलाई और दो सितारे (प्रेमचन्द, रफ़ी पर विशेष)

लेख शुरू करने से पूर्व मैं पाठकों को दो चित्रों से अवगत करना चाहूंगा:—

पहला चित्र:— “प्रेमचंद” की शवयात्रा गुज़र रही थी। तब सामने से गुज़रते किसी अपरिचित व्यक्ति ने पूछा, “कौन था भाई?” तो उसे जवाब मिला, “कोई मास्टर था गुज़र गया।”

दूसरा चित्र:— “रफ़ी” साहब का जब इंतकाल हुआ तो उनके चेहरे में कोई सिकन तक नहीं थी। देखने वाले बोल रहे थे, “फ़रिश्ता, चिरनिंद्रा में लीन है।” किशोर कुमार, रफ़ी साहब के पैर पकड़ कर बच्चे की तरह रो रहे थे। खुद रफ़ी साहब के साले ज़हीर (जो तमाम उम्र रफ़ी साहिब के सेक्रेटरी भी रहे) ज़ार-ज़ार रो रहे थे। उनकी दहाड़ें अच्छे-अच्छों का कलेजा दहला रही थीं। उनका स्वर सबके कानों में गूंज रहा था, “साहब, तुमने मेरे साथ बड़ी नाइंसाफ़ी की। खुद अकेले चले गए? मुझे भी साथ क्यों नहीं ले गए? अल्लाह, मुझे ले जाता। उन्हें बख़्श देता!”

आइये अब मिर्ज़ा ग़ालिब के शेर से लेख का आरम्भ करते हैं:—

सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं।
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं।।

संसारिक नश्वरता को बयाँ करता मिर्ज़ा ग़ालिब का ये शेर शत-प्रतिशत सत्य है। दौलत क्या है? शौहरत क्या है? गुमनामी क्या है? और क्या है मृत्युलोक में ऐसा, जो चिरस्थाई है? कभी नष्ट नहीं होगा? कभी कालातीत नहीं होगा? इस जहान में ऐसी कोई सूरत नहीं, जो खंडित न होगी। ऐसी कोई शख़्सियत नहीं जो काल के गर्त में न समाएगी। शा’इरों ने इसे भिन्न-भिन्न विचारों में व्यक्त किया है। साहिर कहते हैं, “ये महलों, ये तख़्तों, ये ताजों की दुनिया। ये इंसां के दुश्मन समाजों की दुनिया। ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है?” तो निदा फ़ाज़ली फ़रमाते हैं, “दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है। मिल जाये जो मिटटी है, खो जाये तो सोना है।” ख़ैर संसारिक नश्वरता मेरे आलेख का विषय नहीं है। विषय बड़ा विचित्र है। एक साहित्य शिरोमणि हैं तो दूसरी हस्ती फ़िल्मी गायन की सर्वोच्च शिखर पर बिराजमान हस्ती है। दोनों का दूर-दूर तक एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं। कोई तुलनात्मक विश्लेषण नहीं। मगर एक तारीख़ ने दोनों को आपस में ऐसे मिला दिया है कि दोनों को इस दिन याद किये बिना नहीं रहा जा सकता।

अजीब बिडम्बना है या इसे विचित्र संयोग कहा जाये कि 31 जुलाई से दो सितारों का जीवन जुड़ा है। कथा सम्राट प्रेमचन्द और स्वर सम्राट मुहम्मद रफ़ी। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों के शिखर पुरुष। दोनों के विश्वभर में करोड़ों प्रशंसक। दोनों की ख़्याति मृत्यु के पश्चात निरंतर बढ़ी है। दोनों पर काफ़ी कुछ कहा गया है। पत्र-पत्रिकाओं में आलेखों से लेकर नई पुस्तकों का प्रकाशन होता रहा है। बकौल सुप्रसिद्ध संगीतकार नौशाद अली, “रफ़ी साहब की आवाज़ रोज़ ही अमीरों के महलों से ग़रीबों के झोपड़ों तक समान रूप से सुनाई देती हैं।” वहीँ पुराने पाठकों से लेकर नए पाठकों तक में आज तक प्रेमचंद को पढ़ने की ललक वैसे ही बनी हुई है जैसे कि उनके युग में थी। न तो साहित्यकारों के बीच प्रेमचन्द कभी पुराने हुए; न ही आम श्रोताओं से लेकर क्लासिक गायकों के मध्य रफ़ी साहब की मधुर गायिकी को सुनने का कोई मौका। आज भी वही ताज़गी और गर्मजोशी के साथ और रेडियो पर फ़रमाईश के साथ सबसे ज़ियादा रफ़ी को ही सुना जाना उनकी लोकप्रियता को दर्शाता है। हैरानी इस बात को लेकर भी है कि मृत्यु के समय दोनों सितारों की आयु लगभग पचपन-छप्पन वर्ष यानि एक समान थी।

31 जुलाई 1880 को कथा सम्राट प्रेमचन्द का जन्म हुआ तो ठीक सौ बरस बाद 31 जुलाई 1980 ईस्वी को स्वर सम्राट मुहम्मद रफ़ी की मृत्यु हुई। इस दिन दोनों सितारों को याद किया जाता है। जहाँ रफ़ी साहब की स्मृति में देशभर में ‘यादगारे-रफ़ी’ का आयोजन होता है और नए-नए गायक, उनके गाये गीतों को गाकर उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं। वहीँ दूसरी तरफ़ साहित्यप्रेमी अपने प्रिय साहित्यकार प्रेमचन्द की स्मृति में विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। उनकी कहानियों का पाठ और रंगमंच पर अपनी अभिनय प्रस्तुतियाँ करते हैं। बड़ी-बड़ी साहित्यिक बहस और परिचर्चाएँ करते हैं। प्रेमचन्द को उपन्यास सम्राट की उपाधि बंगाल के सुप्रसिद्ध साहित्यकार शरतचंद ने उपन्यासों के क्षेत्र में मुंशी जी के योगदान को देखकर दी थी। वहीँ जनप्रिय गायक होने के कारण जनता-जनार्दन ने रफ़ी साहब को ‘स्वर सम्राट’ की उपाधि से नवाज़ा है। दुर्भाग्य इस बात का है कि भारत सरकार ने इन महान कलाकारों को ‘भारत रत्न’ जैसे सम्मान से अब तक वंचित रखा हुआ है।

प्रेमचन्द (31 जुलाई 1880—8 अक्टूबर 1936) के सम्बन्ध में कुछ जानकारियाँ :— प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को लमही गाँव (वाराणसी) में हुआ था। उनकी माता आनन्दी देवी तथा पिता मुंशी अजायबराय थे। जो कि ग्राम लमही में ही डाकमुंशी थे। उनकी शिक्षा का आरंभ ग्रामीण विद्यालय में उर्दू और फ़ारसी भाषाओँ से हुआ और पढ़ने का शौक उन्‍हें बचपन से ही लग गया। 13 साल की उम्र में ही उन्‍होंने ‘तिलिस्मे-होशरुबा’ पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रचनाकारों रत्ननाथ शरसार, मौलाना शरर और हादी रुस्वा जैसे अदीबों के उपन्‍यासों से रूबरू हो गए। 1898 ई० में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे पास के ही विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए। नौकरी के साथ ही उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। 1910 में उन्‍होंने इंटर पास किया और 1919 में बी.ए. की डिग्री लेने के बाद अंग्रेज़ों के शिक्षा विभाग में इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए। मुंशी जी जब सात वर्ष की अवस्था में अपनी माता जी को और चौदह वर्ष की अवस्था में अपने पिता को खो बैठे तो उनके प्रारंभिक जीवन का संघर्ष आरम्भ हो गया। उनका प्रथम विवाह उनकी मर्जी के विरुद्ध पंद्रह साल की उम्र में हुआ, जो सफल नहीं रहा। उनदिनों प्रेमचंद पर आर्यसमाज का बड़ा प्रभाव था। जो स्वामी दयानन्द के बाद एक बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक आंदोलन बन गया था। अतः उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया और वर्ष 1906 ई० में दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से कर लिया। उनकी तीन संताने हुईं—श्रीपत राय, अमृत राय (जो स्वयं बहुत बड़े साहित्यकार हुए) और कमला देवी श्रीवास्तव। प्रेमचंद को “सोजे-वतन” (प्रथम कहानी संग्रह) के लिए हमीरपुर (उ०प्र०) के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगा। “सोजे-वतन” की सभी प्रतियाँ जब्त कर नष्ट कर दी गईं। तत्पश्चात कलेक्टर ने धनपतराय (प्रेमचन्द का वास्तविक नाम) आरम्भ में इस नाम से ही वह साहित्य रचते थे।) को हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे, यदि लिखा तो … (बड़ी-बड़ी आँखें दिखाते हुए कलेक्टर ने कहा) जेल भेज दिया जाएगा। तब उर्दू में प्रकाशित होने वाली बहुचर्चित पत्रिका “ज़माना” के सम्पादक मुंशी दयानारायण ‘निगम’ ने उन्हें प्रेमचंद (छद्म) नाम से लिखने की सलाह दी। इसके बाद तो इस नाम ने वह ख्याति पाई कि लोग धनपत राय को भूल गए। याद रहा तो सिर्फ “प्रेमचन्द”। उन्‍होंने आरंभिक लेखन निगम साहब की पत्रिका में ही किया। प्रेमचंद ही आधुनिक हिन्दी कहानी के भीष्म पितामह माने जाते हैं। यों तो उनके साहित्यिक जीवन का आरंभ 1901 से हो चुका था लेकिन उनकी पहली हिन्दी कहानी को छपने में चौदह वर्ष और लगे यानी महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के संपादन में जब सरस्वती के दिसम्बर अंक 1915 में “सौत” नाम से कहानी प्रकाशित हुई। उनकी अंतिम कहानी “कफ़न” थी। जो उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानी कही जाती है। इन बीस-इक्कीस वर्षों की अवधि में उनकी कहानियों में अनेक रंग-ढंग पाठकों को देखने को मिलते हैं। प्रेमचन्द युग से पूर्व हिंदी में काल्पनिक एय्यारी (चन्द्रकान्ता—देवकीनन्द खत्री) और पौराणिक धार्मिक रचनाएं (रामायण, महाभारत अथवा संस्कृत साहित्य की हिन्दी में अनुदित कृतियाँ पंचतन्त्र, हितोपदेश, कालिदास, भास आदि के नाटक) आदि ही मनोरंजन का अच्छा माध्यम थे। प्रेमचंद ही विशुद्ध रूप से प्रथम साहित्यकार थे जिन्होंने हिंदी के लेखन में मौलिक यथार्थवाद की शुरूआत की। यहाँ प्रेमचन्द के यशस्वी साहित्यकार पुत्र अमृतराय की बात का ज़िक्र करना ज़रूरी है। कलम का सिपाही (प्रेमचंद की जीवनी) में उन्होंने लिखा है कि “संयोग से बनारस के पास ही चुनार के एक स्कूल में पिताजी को मास्टरी मिल गई। लगभग दो दशक तक वे मास्टर रहे। इसी मास्टरगिरी के चलते प्रेमचंद को घाट-घाट का पानी पीना पड़ा। कुछ-कुछ बरस में यहाँ से वहाँ तबादले होते रहे—प्रतापगढ़ से, इलाहबाद से, कानपुर से, हमीरपुर से, बस्ती से, गोरखपुर से। इन सब स्थान परिवर्तनों से शरीर को कष्ट तो हुआ ही होगा और सच तो यह है कि इसी जगह-जगह के पानी ने उन्हें पेचिश की दायमी बीमारी दे दी, जिससे उन्हें फिर कभी छुटकारा नहीं मिला, लेकिन कभी-कभी लगता है कि ये कुछ-कुछ बरसों में हवा-पानी का बदलना, नए-नए लोगों के सम्पर्क में आना, नयी-नयी जीवन स्थितियों से होकर गुज़रना, कभी घोड़े और कभी बैलगाड़ी पर गाँव-गाँव घूमते हुए प्राइमरी स्कूलों का मुआयना करने के सिलसिले में अपने देशकाल के जन-जीवन को गहराई में पैठकर देखना, नयी-नयी सामाजिक समस्याओं और उनके नए-नए रूपों से रूबरू होना, उनके लिए रचनाकार के नाते एक बहुत बड़ा वरदान भी था। दूसरे किसी आदमी को यह दर-दर का भटकना शायद भटका भी सकता था पर मुंशीजी का अपनी साहित्य सर्जना के प्रति जैसा अनुशासन, समर्पण आरम्भ से ही था, यह अनुभव सम्पदा निश्चय ही उनके लिए अत्यंत मूल्यवान सिद्ध हुई होगी।” (इसका ज़िक्र संपादक सुरंजन ने “तीन पीढ़ियाँ : तीन कथाकार” जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक में किया है। इसमें प्रेमचन्द/मोहन राकेश/महावीर उत्तरांचली की चार-चार प्रतिनिधि कहानियाँ दीं गईं हैं।)

साहित्य के अनेक रूपों में प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि प्रवृत्त हुई है— उपन्यास, कहानी, नाटक लिखे। साथ ही पत्रिकाओं में अपने विचारों को समीक्षा, आलेख, संस्मरण, सम्पादकीय आदि, के माध्यम से (‘हंस’, ‘माधुरी’, ‘जागरण’, ‘चाँद’, ‘मर्यादा’, ‘स्‍वदेश’) आदि साहित्यिक पत्रिकाओं में अभिव्‍यक्‍त किया है। जिन्हें बाद में उनके यशस्वी पुत्र अमृतराय द्वारा संपादित करके ‘प्रेमचंद : विविध प्रसंग’ (तीन भाग) में छपा गया है। प्रेमचंद एक सफल अनुवादक भी थे। उन्‍होंने अपने स्वयं के उर्दू साहित्य को हिंदी में पिरोने से इसकी शुरुआत की थी। अपने अलावा उन्होंने रतननाथ सरशार के उर्दू उपन्‍यास ‘फसान-ए-आजाद’ का हिंदी अनुवाद ‘आजाद कथा’ बहुत मशहूर हुआ। इसके अलावा दूसरी भाषाओं के जिन लेखकों को उन्होंने प्रमुखता से पढ़ा और प्रभावित हुए, उनकी कृतियों का अनुवाद भी कुशलता से किया। ‘टॉलस्‍टॉय की कहानियाँ’ (1923), गाल्‍सवर्दी के तीन नाटकों का ‘हड़ताल’ (1930), ‘न्‍याय’ (1931) और ‘चाँदी की डिबिया’ (1931) नाम से अनुवाद किया।

मोहम्मद रफ़ी (24 दिसम्बर 1924—31 जुलाई 1980) के सम्बन्ध में कुछ जानकारियाँ:— मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर1924 को गाँव: कोटला सुल्तान सिंह (अमृतसर) में हुआ था। महान गायक के बारे में ये सोचकर हैरानी होती है कि इनके परिवार का संगीत से कोई खास सरोकार नहीं था। इनके बड़े भाई की नाई दुकान थी, रफ़ी का वक्त वहीं पर गुजरता था। रफ़ी जब सात साल के थे तो वे अपने बड़े भाई की दुकान से होकर गुजरने वाले मुस्लिम फ़क़ीर का पीछा किया करते थे, जो उधर से गाते हुए जाया करता था। उसकी आवाज रफ़ी को इतनी भायी कि रफ़ी उस फ़क़ीर की हूबहू नकल करने लगे। उनके बड़े भाई हमीद ने इनके संगीत के प्रति इनकी रुचि को देखा और उन्हें उस्तादे-मोहतरम अब्दुल वाहिद ख़ान के पास संगीत शिक्षा के लिए भेजा। एक क़िस्सा उस समय के ऑल इंडिया रेडियो का है। लाहौर में उस समय एक प्रोग्राम में प्रख्यात गायक-अभिनेता के एल सहगल को बुलाया गया था। अतः उनको सुनने हेतु रफ़ी अपने बड़े भाई के साथ वहां उपस्थित थे। बिजली गुल हो जाने की वजह से सहगल ने गाने से मना कर दिया था। तब रफ़ी के बड़े भाई ने आयोजकों से निवेदन किया कि, भीड़ की व्यग्रता को शांत करने के लिए उनके छोटे भाई (रफ़ी) को गाने का एक मौक़ा दिया जाये। किसी अनहोनी की आशंका से पब्लिक को शांत कराने हेतु रफ़ी साहब को गाने की अनुमति मिल गई और इस तरह 13 वर्ष की किशोरावस्था के रफ़ी का ये पहला सार्वजनिक प्रदर्शन हुआ। संयोग से प्रेक्षकों में श्याम सुन्दर, जो उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार थे, ने भी उनको सुना और काफी प्रभावित हुए। उन्होने बालक रफ़ी को अपनी अगामी फ़िल्म के लिए गाने का न्यौता दिया। मोहम्मद रफ़ी का पहला गीत एक पंजाबी फ़िल्म गुल बलोच के लिए रिकॉर्ड हुआ। जिसे उन्होने श्याम सुंदर के निर्देशन में 1944 में गाया। सन् 1946 में मोहम्मद रफ़ी ने बम्बई आने का फैसला लिया। जहाँ सबसे पहले संगीतकार नौशाद अली ने “पहले आप” नामक फ़िल्म में गाने का मौका दिया। इसके बाद कई गीत रफ़ी गाते चले गए। “तेरा खिलौना टूटा ” (फ़िल्म अनमोल घड़ी 1946) से रफ़ी को हिन्दी जगत में ख्याति मिली। 1951 में आई “बैजू बावरा” रफ़ी के जीवन में एक टर्निंग पॉइन्ट साबित हुई। यह मौक़ा भी संयोग से मिला। जब नौशाद “बैजू बावरा” के लिए गाने बना रहे थे तो उन्होने अपने पसंदीदा गायक तलत महमूद से गवाने की सोची थी क्योंकि उस वक्त रफ़ी से ज़ियादा तलत हिट थे। लेकिन नौशाद ने स्टूडियो में ही एक बार तलत महमूद को धूम्रपान करते देखकर अपना मन बदल लिया और “बैजू बावरा” के सारे गाने रफ़ी से गाने को कहा। बैजू बावरा के गानों ने रफ़ी को मुख्यधारा गायक के रूप में स्थापित किया। इसके बाद तो रफ़ी ने तक़रीबन हर संगीतकार के लिए गाया। इस सूची में शंकर-जयकिशन, सचिन देव बर्मन, ओ पी नैय्यर, रवि, मदन मोहन, गुलाम हैदर, जयदेव, सलिल चौधरी आदि । 1951 से यह सिलसिला 1980 तक अनवरत चलता रहा। मोहम्मद रफ़ी एक बहुत ही समर्पित मुस्लिम, व्यसनों से दूर रहने वाले तथा अत्यन्त शर्मीले स्वभाव के व्यक्ति थे। 1947 ई० में आजादी के समय दर्दनाक विभाजन के दौरान भी उन्होने भारत में ही रहना पसन्द किया। उन्होने विक़लिस बेगम से शादी की और उनकी सात संतान हुईं-चार बेटे तथा तीन बेटियां। मोहम्मद रफ़ी को सिर्फ़ गायन के लिए ही नहीं बल्कि उनके परमार्थो के लिए भी जाना जाता है। अपने शुरुआती दिनों में संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए उन्होने बहुत कम पैसों में गाया था। गानों की रॉयल्टी को लेकर लता मंगेशकर के साथ उनका विवाद भी उनकी दरियादिली का अच्छा उदाहरण है। उस समय लताजी का मानना था कि गाने गाने के बाद भी उन गानों से होने वाली आमदनी का एक अंश या रॉयल्टी गायकों/गायिकाओं को मिलना चाहिए। रफ़ी साहब इसके विरुद्ध थे क्योंकि उनका मानना था, यदि एक बार गाने रिकॉर्ड हो गए और गायक/गायिकाओं को उनकी फीस का भुगतान कर दिया तो उनको और पैसों की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। अतः इस बात को लेकर दोनो महान कलाकारों के बीच मनमुटाव हो गया। लता ने रफ़ी के साथ गाने से मना कर दिया और बरसों तक दोनो का कोई युगल गीत नहीं आया। अभिनेत्री नरगिस के प्रयासों से दोनो ने पुनः साथ-साथ गाना आरम्भ किया। इस तरह हिंदुस्तान की सर्वाधिक रोमांटिक गायक युगल जोड़ी का “ज्वैल थीफ़” फ़िल्म में कमबैक सांग “दिल पुकारे आ रे आ रे” रिकॉर्ड हुआ।

सन 1931 में जब पहली बोलती फ़िल्म “आलमआरा” बनी। तब से पार्श्वगायन की शुरुआत हुई। अब तक लाखों गीत पूरे भारतवर्ष में रिकार्ड हुए हैं। यहाँ कुछ हिंदी गायकों को तालिका दी जा रही है।
______________________________________________________________________________

गायक / गायिका गाये गए गीतों की संख्या
______________________________________________________________________________
रफ़ी (१९२४-१९८०) फ़िल्मी गीत (4,525) और ग़ैर फ़िल्मी गीतों की संख्या (400) हैं।
लता (जीवित) फ़िल्मी गीत (5,080) और ग़ैर फ़िल्मी गीत (डेढ हज़ार) हैं।
मुकेश (१९२३-१९७६) फ़िल्मी गीत (1,000) हैं।
किशोर (१९२९-१९८७) फ़िल्मी गीत (2,900) हैं।
आशा भोसले (जीवित) इनके सबसे अधिक फ़िल्मी-ग़ैर फ़िल्मी मिलाकर 10,000 गीत हैं।
_____________________________________________________________________________

*ये आँकड़े विभिन्न गीत कोशों और संकलनों से जुटाए गए हैं। गीतों की संख्या में थोड़ा बहुत
परिवर्तन हो सकता है। लेकिन ये अनुमान 99 प्रतिशत सही हैं।
______________________________________________________________________________

रफ़ी ने अपने जीवन में कुल कितने गाने गाए इस पर भले ही उनके चाहने वालों के मध्य कुछ भ्रांतियाँ और विवाद हैं, मगर वह सर्वश्रेष्ठ हिन्दी पार्श्व गायक थे, इसमें सभी एकमत हैं। हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग में गीत-संगीत के क्षेत्र में कड़ा मुकाबला था। अच्छा काम करने के बावजूद गायक/गीतकार और संगीतकार पुरस्कार प्राप्त करने से वंचित रह जाते थे। फिर भी रफ़ी साहब ने अनेकों सम्मान जीते। उन्हें फ़िल्म फेयर पुरस्कार जिन गीतों के लिए मिला, वह इस प्रकार हैं:– चौदहवीं का चांद हो (फ़िल्म – चौदहवीं का चांद); तेरी प्यारी प्यारी सूरत को (फ़िल्म – ससुराल); चाहूंगा में तुझे (फ़िल्म – दोस्ती); बहारों फूल बरसाओ (फ़िल्म – सूरज); दिल के झरोखे में (फ़िल्म – ब्रह्मचारी); क्या हुआ तेरा वादा (फ़िल्म – हम किसी से कम नहीं), पद्मश्री 1965 में मिला।

अंत में यही कहना चाहूंगा कि कला किसी पुरस्कार की मोहताज़ नहीं होती। कलाकार साहित्यकार द्वारा किया गया श्रेष्ठ कार्य ही और पाठकों की और चाहने वालों की प्रशंसा उचित सम्मान है। दोनों अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग कामों के लिए जाने, माने और पहचाने जाते हैं। उसके बावजूद दोनों भारत माता के महान सपूत हैं। फिर भी मैं चाहूंगा दोनों को भारत रत्न मिलना ही चाहिए।

2 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/03/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 23/03/2018

Leave a Reply