ग़ज़ल-सुलगते हुये लफ्ज़ सबकी जुबां पर |

सुलगते हुये लफ्ज़ सबकी जुबां पर |
जले है घरौंदे जो देखो यहाँ पर ||

छिपाये हंसी में बशर साजिशो को |
गले लग करे वार जाने कहाँ पर ||

जमीं पर बहा खून कितनो का देखो |
मिले कातिलों को सजा आसमां पर ||

लगा आस बैठा बशर रब से हर इक |
बना है खुदा आज पैसा यहाँ पर ||

लगे है सभी देखने कागजो को |
गया छोड़ वालिद “मनी” क्या कहाँ पर ||

मनिंदर सिंह “मनी”

6 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 20/03/2018
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/03/2018
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/03/2018
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 21/03/2018
  5. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 22/03/2018
  6. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 23/03/2018

Leave a Reply