प्रकृति-प्रणय गीत

प्रकृति-प्रणय गीत

संध्या की स्वर्णिम किरणों से
आलिंगनों का ले उपहार
सजी सँवारी संध्या-सी तब
करती प्रकृति सोलह श्रंगार।

पश्चिम की लाली में बिंधकर
शर्माती सकुचाती जाती
क्षितिज पार झुरमुट के पीछे
दुल्हन-सी वह लुक छिप जाती।

खगवृन्दों के सुर गुंजन से
निखर रही नुपुर की झंकार।
डाल डाल पर झूम झूम कर
प्रणय स्वरूप दिखता संसार।

शीतल झोंकों का स्पर्श मधुर
जब सिरहन-सा उपजाता है
पलकों के अंदर नयनों में
चाँद रूप सा खिल जाता है।

छिलमिल तारों की सेज चढ़ी
चपल चांदनी इतराती है
ओढ़ पंखुड़ी की सी चुनरी
रजनी रमती खिल जाती है।

तारों की नटखट छिलमिल भी
कहती है अधरों की बातें
छलक रहे ज्यों अधरपटों पर
अलसायी-सी कुनमुन यादें।

सी सी करती पवन सुहानी
प्रणय वेग परिभाषित करती
डाल डाल की पात पात पर
पिय चुम्बन को अंकित करती।

थकी थकी सी सहज सेज पर
सपनों में बस खो जाती है
करवट लेती कली कली ज्यों
मुस्कानें ले सो जाती है।

तभी सुबह पूरब से आकर
बिखराती है किरणें नभ पर
रात लजाती छिप जाती है
उषा किरण की लाली पाकर।

सूरज से ले कुंकुम डिबिया
तब सजग प्रकृति इठलाती है
किरणों की झुरमुट में छिपकर
वह नव श्रंगार सजाती है।

प्रकृति के प्रणय गीत सुन तब
कोयल कुहुक कुहुक जाती है
चिड़ियाँ सारी फुदक फुदक कर
मन ही मन बस मुस्काती है।
…. भूपेन्द्र कुमार दवे
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13 Comments

  1. kiran kapur gulati Kiran kapur Gulati 17/03/2018
    • bhupendradave 22/03/2018
  2. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 19/03/2018
    • bhupendradave 22/03/2018
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 19/03/2018
    • bhupendradave 22/03/2018
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/03/2018
    • bhupendradave 22/03/2018
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/03/2018
    • bhupendradave 22/03/2018
  6. C.M. Sharma C.M. Sharma 21/03/2018
    • bhupendradave 22/03/2018
  7. chandramohan kisku chandramohan kisku 10/04/2018

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