नयी उम्र की नयी फसल(ग़ज़ल )

नयी उम्र की नयी फसल(ग़ज़ल )

नयी उम्र की नयी फसल ,

बहकी हुई भटकी हुई नस्ल .

नस्ल तो है यह आदम जात ,

भूल गयी जो अपनी ही शक्ल .

भौतिकता औ आधुनिकता ने ,

कुछ इस तरह दिया इसे बदल .

शराफत ,तहजीब और मुहोबत ,

दिल नहीं इनमें पर काफी अक्ल .

विदेशी भाषा ,संस्कृति और लिबास ,

पूरी तरह गोरों की करते है यह नक़ल .

यह लिखेंगे वतन का मुस्तकबिल !

वतन की इज्ज़त को करते है धूमिल .

यह नस्ल तो सगी नहीं अपने माँ-बाप की ,

उनके अरमानो/ज़ज्बातों को देते है कुचल .

बचाना है गर देश का भविष्य तो जागना होगा ,

ज़हरीली उग रही इस पौध को जड़ से उखाड़ना होगा.

और पैदा करनी होगी देशहित में नयी उपयोगी फसल.

5 Comments

  1. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 14/03/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 14/03/2018
  3. Astha Gangwar Astha Gangwar 15/03/2018
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 19/03/2018
    • Onika Setia Onika Setia 20/03/2018

Leave a Reply