प्रयत्न

मुश्किलों के चक्रवात जब अपना जोर दिखाते हैं ।
मेरे अस्तित्व के घरोंदे को जड़ से उखाड़ जाते हैं ।
जुगनु सी हिम्मत चमकती है,
जब कुछ पलों के कोने में,
उसी मोड़ पर तेज धार
मुझे फिर पीछे छोड़ जाती है ।
अकेला तड़पता,तरसता ,छटपटाता –
करता रहता हूँ संघर्ष ।
मार कर मन को,
हरा कर थके तन को
कोशिशों के बाण ,
अल्प अवसरों के धनुष पर चढ़ाता हूँ ।
शिथिल हाथ,
झकझोर हवा के थपेड़े !
अनिश्चितता के अंधेरे !
बेताल की तरह मेरेँ काँधे निचोड़े जाते हैं ।
तभी मरु भूमि में-नखलिस्तान की तरह !
भोले बालक की मुस्कान की तरह !
पतझड़ में फूटी कोंपलों की तरह !
किसी पंछी की पहली उड़ान की तरह !
असफल प्रयत्नों में छिपे
खोटे-प्रयत्न की तरह !
मेरी हिम्मतों को देते अवलम्ब !
सफलता मेरे लिए
और मैं सफलता के लिए
विजय श्री का हार गूँथ लाता हूँ ।।
मुक्ता शर्मा

2 Comments

  1. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 06/03/2018
  2. Brij mohan 09/03/2018

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