आदर्श-होली

नए युग के युवाओं छोड़ दो पुरानी रूढ़ि

बूढी बातों में विवेक को न भटकाइए

नित्य परिवर्तन सिद्धिमूल है प्रकृति का

समय के सुर में मिला के सुर गाइये

नयी पीढ़ी नए हैं विचार नए उद्गार

क्यों न होली भी नए तरीके से मनाइये

 

पहले प्रचुर थी वनस्पति ,घने थे वन

कोई प्रदुषण सी समस्या न विकत थी

किन्तु आज वनों के बचाव का भी है सवाल

वातावरण की शुद्धता का संकट भी

 

होली की आग में जला के पेड़ पौधों को

अपने ही पावं पे कुल्हाड़ी न चलाइये

वनों को न नष्ट करो रक्ष्य वन सम्पदा है

इन्हें जला के प्रदूषण और न बढ़ाइए

 

आज बढ़ते ही जा रहे हैं द्वेष दुराचार

इनके निदान का उपाय समझाइये

ऐक्य-पथ में अड़ी जो द्वेष्य कंटकों की झाड़ी

प्रेम-अग्नि में बना के होलिका जलाइए

 

प्रेम का चटक रंग ,रंग लो रे अंग-अंग

वाणी की ले पिचकारी रंग बरसाइये

ऐसी होली खेलने से जी नहीं चुराए कोई

होली की रंगोली में मिलन-गीत गाइये

 

भंग से गंभीर सद्भाव का नशा बना के

इस नशे में सारी तू-तू मैं-मैं भूल जाइये

ऐसी आदर्श होली खेल कर उमंग से

होली त्यौहार के भी मान को बढ़ाइए

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 03/03/2018
  2. Kajalsoni 03/03/2018

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