अशार

मेरे होटों पे अभी तक है तबस्सुम के सिलसिले
गयी रात मेरे ख्वाबों में वो जो हमसे आ मिले

मुझको तो एक पल की भी फुर्सत नहीं तुझसे
तुझको कहाँ से है मुझसे इतने शिकवा-गिले

आये हो मेरे पास तो बैठो दो चार पल
दो चार पल ही सही जीने को कुछ तो बहाना मिले

ऐसे तो मेरे मर्ज़ की कोई दवा नहीं
वैसे अगर तू देख ले तो चेहरा मेरा खिले

मुनासिब है फासलें हो यूँ ही दरमियान अपने
कहीं क़ुर्बतों के बढ़ने से बढ़ जाए ना मुश्किलें

जिनको समझ रहा था मैं हमराज़ हमकदम
बदली रुतें तो वो मेरे मुखालिफ से जा मिले

तेरे तस्सवुरात में कुछ भी न हो मेरे सिवा
मुझको मेरी वफ़ा का कुछ तो सिला मिले

 

9 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 11/02/2018
    • Dr. Nitin Kumar pandey Nitin Pandey 12/02/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharmaकक 12/02/2018
    • Dr. Nitin Kumar pandey Nitin Pandey 12/02/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 12/02/2018
    • Dr. Nitin Kumar pandey Nitin Pandey 12/02/2018
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 12/02/2018
    • Dr. Nitin Kumar pandey Nitin Pandey 16/02/2018
  5. Kajalsoni 16/02/2018

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