।। चिन्तन ।।

॥ चिंतन ॥
जीवन में हर मानव के, अनुभव होते भिन्न भिन्न ।
कोई संतुष्ट उपल्बधियों से, किंतु मन सदा रहता है खिन्न ॥ 1 ॥
क्या खोया क्या पाया किसने, याद दिला सकता है कौन ।
चिंतन इसका तब हो पाता, जब मन हो जाता हो मौन ॥ 2 ॥
जीवन सरिता के प्रवाह में, पाने-खोने का क्रम चलता रहता ।
उपलब्धियाँ भूलतीं चार दिनों मे, खोने का दु:ख आजीवन रहता ॥ 3 ॥
विधाता की इक अनमोल कृति, जो ‘समय’ कहलाती है ।
उपलब्धियों पर लगवाती ठहाके, दु:ख मे रूदन कराती है ॥ 4 ॥
केवल प्राप्तियों से मानव, चिंतक कदापि न बन सकता है ।
न ही प्राप्ति की संजो स्मृतियाँ, आनंद से जीवन भर सकता है ॥ 5 ॥
केवल दु:ख का प्रहार ही, चिंतन को गति है दे सकता ।
केवल इसकी पीड़ा से ही, पीड़ित है चिंतक बन सकता ॥ 6 ॥
कारण कष्ट का विस्मृति काल, दीर्घ काल तक रहता है ।
जिसे स्मरण कर मानव, जीवन में चिंतन भर सकता है ॥ 7 ॥
अनुभव स्मृतियों को कर एकत्रित, मानव बुद्धि से मथता है ।
मंथन से जो घृत होता है प्रकट, वह जाकर चिंतन बनता है ॥ 8 ॥
एकांत साधना की अग्नि प्रकट होती, तब जाकर घृत है प्रकट होता ।
चिंतन का रूप कर धारण, बीती स्मृतियों को ढ़ोता ॥ 9 ॥
किसी ने मातु-पिता बचपन में, किसी का दु:ख से टूटा दिल ।
कोई संघर्षों की लिये याद, होता प्रसन्न कि मिली मंजिल ॥ 10 ॥
घटनाक्रम जीवन के किसी को, सदा न रहने देते प्रसन्न ।
न हीसर्वदा देते दु:ख, जिससे मन रहता अप्रसन्न ॥ 11 ॥
महान चिंतकों के दु:ख भी, बड़े ही भारी होते हैं ।
किन्तु उनके चिंतन भी, चिन्ता पर हावी होते हैं ॥ 12 ॥
अनुभव है यह बतलाता, कि ईश्वर का न्याय है पारदर्शी ।
किसी से ना करता पक्षपात, वह है सदा-सर्वदा समदर्शी ॥ 13 ॥
किसी को दु:ख देने के पहले, करवाता है आभास ।
मानव संकेत न समझता उसके, मन में रखता झूठी आस ॥ 14 ॥
दार्शनिकों का चिंतन कहता, कि विश्व सकल है कौतूहलमय ।
ऋषियों का चिंतन कहता है, यह जग है पूर्णत: मायामय ॥ 15 ॥
यह एक झूठी माय़ा है, जो दिवास्वप्न दिखलाती है ।
पल पल करती भ्रमित मानव को, नित नया रूप दिखलाती है ॥ 16 ॥
सामान्य मानव के जीवन का, होता केवल इतना सार ।
क्या खोया क्या पाया हमने, जीवन को कैसे किया पार ॥ 17 ॥
यह भी चिंतन का अनुभव है कि, ईमान का फल मीठा होता ।
यह भी चिंतन बतलाता है, ईमान अपना मानव रोता ॥ 18 ॥
चिंतन से ऑसू झरते हैं, जब जाने वाले आते याद ।
बीती स्मृतियाँ देतीं झकझोर, बीते दिनों को कर के याद ॥ 19 ॥
यह सच है कि चिंतन कर मानव, केवल खोए हुए का करता ध्यान ।
पर है ‘चिंता’ का प्रबल शत्रु, करो सदा इसका सम्मान ॥ 20 ॥
चिंतन जब भी प्रकट हो मन में, धारा को प्रकट हो जाने दो ।
नव सीख ही देकर जायेगा, व्यर्थ न इसको जाने दो ॥ 21 ॥

अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 23/01/2018
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 23/01/2018
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 24/01/2018
  4. Kajalsoni 25/01/2018
  5. अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव AKHILESH PRAKASH SRIVASTAVA. 26/01/2018

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