मंदिर वहीं होना होगा

सबके अपने तर्क हैं, सबके अपने राम।
हमलावरों ने देश का, किया काम तमाम।
नहीं शिकायत राम को, नहीं वनवासी राम।
तन मन ह्रदय में बसे, रघुवर आठों याम।
कोई कैफियत कैफ़ी की, बुझा न सकेगी आग।
भारत माँ के भाल पर, बाबर का ये दाग।
सरयू भी बहती रहे, लिए ह्रदय में पीर।
राम तरसे निज गृह को, आप करें तकरीर।
साज़िसें चलती रहे, सेक्युलिरिज्म के नाम।
इक तरफा सुलह की कोशिश, सदा होगी नाकाम।
घर हमारा दरबदर हम ही, ये कैसा कोहराम।
आखिर कब तक टाट में, बैठे रहेंगे राम।
इसलिए मेरी तो कविता, तुष्टिकरण करती नहीं।
सच को सच कहने से, ये कभी डरती नहीं।
सच ये है, बाबर केवल एक हमलावर हत्यारा था।
जिसने भारत भू पर, हमको चुन चुन कर के मारा था।
इतिहासों के उन काले धब्बो को धोना होगा।
जहां राम का जन्म हुआ, मंदिर वहीं होना होगा।।

– मनोज चारण ‘कुमार’
रतनगढ़
मो. 9414582964

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/01/2018
  2. Kajalsoni 11/01/2018

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