मंदिर वहीं बनेगा

ये मुद्दा नहीं मंदिर का केवल, ये स्वाभिमान की बाते है।
घनघोर गरजती औरंगजेबी शासन वाली रातें हैं।
ये चिंगारी है दबी हुई, सदियों से उर में सुलग रही।
दावानल बन कर भड़केगी, ये जाने कब से धधक रही।
रामलला के महलों पर, अन्यायी ने डाका डाला है।
इतिहासों की भूलों को हमने, अबकी बार सम्भाला है।।
इसलिए मेरी कविता कभी, तुष्टिकरण नहीं करती।
सच को सच कहने से, मेरी कविता कभी नहीं डरती।

बाबर को हमलावर कहना, यदि देश मे गाली है।
तो झूठा मेरा कविता पढ़ना, झूठी आपकी ताली है।
सच ये है, बाबर केवल एक हमलावर हत्यारा था।
जिसने भारत भू पर, हमको चुन चुन कर के मारा था।
बाबर वो था जिसने मेरे रामलला पर घात किया।
शांत सुरम्य अवध में जिसने, महाघोर उत्पात किया।
बाबर ने ललकारा उस दिन, लव-कुश की संतानों को।
रामलला भी तरस रहे हैं, अब तक निजी ठिकानों को।।

सरयू भी बहती रहे, लिए ह्रदय में पीर।
राम तरसे निज गृह को अपने, आप करें तकरीर।
घर हमारा, दरबदर हम ही, ये है कैसा कोहराम।
आखिर कब तक टाट-तम्बू में, बैठेगे श्रीराम।
नहीं शिकायत राम को, नहीं वनवासी राम।
सबके तन मन ह्रदय में बसते, रघुवर आठों याम।
लेकिन इतिहासों के उन काले धब्बो को धोना होगा।
जहां राम का जन्म हुआ, मंदिर वहीं होना होगा।।
इतिहासों की खबर ली है अब, लव कुश की संतानों ने।
रामलला अब नहीं रहेंगे, तंबुओं में शामियानों में।।

– मनोज चारण “कुमार”
रतनगढ़
मो. 9414582964

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 08/01/2018
  2. Kajalsoni 11/01/2018

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