नफरतों को छोड़कर , कलियाँ बहार की चुन

ऐ मेरे ! तू प्यार सुन , तू प्यार से मेरी धुन

नफरतों को छोड़कर , कलियाँ बहार की चुन

सुबह को उठता है एक माली , सुबह होती फूलों से
नई नई कलियाँ खिल गयी अब तो , न डर है शूलों से
कितने फूलों को जन्म देता , बनती माँ हर डाली
सूरज जो सिर पर चमके तो , राजा समझे माली
छोड़कर , तू ईर्ष्या , तू माली जैसी कर धुन
नफरतों को छोड़कर……..

आता है जो एक शिकारी , डाले दाना पानी
फंस जाते कुछ भोले पंछी , या भूखे नादानी
देखो तीर चलाता है वो , अर्जुन समझ के खुद को
कर हत्या निर्दोषों की , वीर समझता खुद को
छोड़ कर , इस रीत को , तू प्रेम की माला फिर बुन
नफरतों को छोड़कर………

कितने लोग अनोखे है , मन की बातें निराली
हर शाख पर पत्ते भिन्न ,अतरंगी हर डाली
भिन्न भिन्न हो भाषा धर्म , एक हो सब खड़े हो
चाहे विपत्ति हो कैसी भी ,साथ मे सब अड़े हो
कितनी भी , तकलीफ हो , दिल की तो एक बार सुन
नफरतों को छोड़कर ……..

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

 

24 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 01/01/2018
  2. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 01/01/2018
  3. Kajalsoni 01/01/2018
  4. ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 01/01/2018
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/01/2018
  6. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar prasad sharma 02/01/2018
  7. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 02/01/2018

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