रौशनी के लिए

रौशनी के लिए
——————

सुबह दहलीज में पड़ी
अख़बार नहीं हूँ मैं
पढ़ती हूँ सुबह -सुबह
जल्दी में
और शाम को
फ़ेंक देते हो रद्दी के साथ

कैलेंडर भी नहीं हूँ
जो टांगा रहता है दीवाल के
एक कोने में
और आने – जानेवाली तूफान
पन्ने खुलती है बंद करती है
अपनी खुसी से

जुड़े में खोंसा
सुन्दर सुगंध फूल भी नहीं हूँ
जो बाजार और मेलों की भीड़ में
जुड़ा से गिरकर धूल में मिल जाती है

खिड़की के कांच में
लगा धूल हूँ मैं
पोंछकर साफ करना होगा तुम्हें
अपने घर में ज्यादा रौशनी की
प्रवेश निरंतर करने के लिए

तुम्हारी समाज की हवेली में
खिड़की की कांच में
लगा अन्धविश्वास
और अशिक्षा की धूल हूँ
साफ करना होगा तुम्हे
समाज की हवेली में
सुख -शांति और शिक्षा की
रौशनी के लिए .

……चंद्रमोहन किस्कू

7 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 01/01/2018
  2. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 01/01/2018
  3. Kajalsoni 01/01/2018
  4. ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 02/01/2018
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 02/01/2018

Leave a Reply