खुद को तोड़ ताड़ के 

कब तक चलेगा काम खुद को जोड़ जाड के
हर रात रख देता हूँ मैं, खुद को तोड़ ताड़ के ||

तन्हाइयों में भी वो मुझे तन्हा नहीं होने देता
जाऊं भी तो कहाँ मैं खुद को छोड़ छाड़ के ||

हर बार जादू उस ख़त का बढ़ता जाता है
जिसको रखा है हिफ़ाजत से मोड़ माड़ के ||

वैसे  ये भी कुछ नुक़सान का सौदा तो नहीं
सँवार ले खुद को वो अगर मुझको बिगाड़ के ||

खुशबू न हो मगर किसी को ज़ख्म तो न दे
तुलसी लगा लूँ आँगन में गुलाब उखाड़ के ||

9 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 10/12/2017
  2. डी. के. निवातिया Dknivatiya 10/12/2017
    • shivdutt 11/12/2017
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 11/12/2017
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 11/12/2017
  5. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 11/12/2017

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