प्रभात वर्णन (भाग 2)

*प्रभात वर्णन*
(भाग 2)

स्वर्ण रश्मियाँ बरसीं खुलकर,
पर्वत शिखर अरुणमय होकर|
श्वेत वर्ण सिंचित यह अम्बर,
लगती है छवि अनुपम सुंदर।

पावन प्रात सुहावन बेला,
नव्य सृजन का लगता मेला।
किरण छुवन धरती मुस्कायी,
मुख मण्डल पर आभा छायी।

बीत गयी वो रजनी काली,
अन्धकार फैलाने वाली।
सप्तवर्ण की बनती जाली,
अम्बर पर अब छायी लाली।

धन्य धन्य! रचना,रचनाकर,
कण कण में दिखता है ईश्वर|
नवल सृजन का अनुपम अवसर,
स्वागत करें दिवस का मिलकर|

_’अरुण’

8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/12/2017
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 10/12/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 10/12/2017
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 10/12/2017
  3. डी. के. निवातिया Dknivatiya 10/12/2017
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 14/12/2017
  4. C.M. Sharma C.M. Sharma 11/12/2017
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 14/12/2017

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