प्रभात वर्णन

*यह प्रभात की बेला अनुपम*

बीती निशा मिटा अँधियारा,
चन्द्र-भानु को मिला किनारा|
खग कुल जगे प्रात गुण गाते,
नेह राग का गीत सुनाते।

रवि रथ की है छँटा निराली,
सुमनों के अधरों पर लाली|
बहती मलय समीर सुगन्धित,
उत्पल दल विस्तारित शोभित।

पात-पात निर्झर रस मोती,
वसुंधरा लालिमा सँजोती।
पूरब दिशि उजियारा फैला,
पश्चिम का है आँगन मैला।

लहके लह लह खेती क्यारी,
महके मह मह बारी-बारी|
अवनि हृदयतल शीतल मद्धम,
यह प्रभात की बेला अनुपम।

-‘अरुण’

8 Comments

  1. डी. के. निवातिया Dknivatiya 08/12/2017
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 09/12/2017
  2. ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 09/12/2017
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 09/12/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 09/12/2017
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 09/12/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 09/12/2017
    • अरुण कुमार तिवारी अरुण कुमार तिवारी 09/12/2017

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