जख्मी परिंदे

परिंदे जख्मी मिलते है राहो चौराहों पर,
पर चौराहों पर भीड़ है जिंदा लाशों और दरिंदों कि,
की दरिंदों ने साज़िश है फ़िर हुए जख्मी परिंदे ,
परिंदे जख्मी मिलते है अब तो घरों कि चिलमन पर ,
पर चिलमन दह़क उठी इंसाफ के अंगारों पर ,
पर अंगारे भी अब बुझ गये समाज पर लगा कालिक ,
कालिक लगी मीटती नही गहरी हो जाती हर रोज़ ,
रोज़ हर खबरों मे मिलते है ये जख्मी परिंदे ।

3 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 05/12/2017
  2. Vikram jajbaati Vikram jajbaati 11/12/2017
  3. Vikram jajbaati Vikram jajbaati 11/12/2017

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