उठता धुआँ

आँखें गूँगी, जुबाँ भी कुछ कुछ धागे सी बेजान है।
सोच का पैमाना छोटा समझें या लफ्जों को नाकारा कह दें।।

2 Comments

  1. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 05/12/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 06/12/2017

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