शब्द कुछ यूं ही

न जाने दिन चढ़ा कब, ढला कहाँ है ??
बेसुध हैं जिनकी सुध में, उन्हें सुध ही कहाँ है…

जो हासिल थे कभी लम्हें, वो लम्हें गमजदा हैं,
मेरे चाहत को मेरी ख्वाईश की आहट ही कहाँ है…

तिश्नगी है जिनके अहसासों की वो मुक़ाबिल नहीं !
मन के इन अंधेरों को, मयस्सर रौशनी कहाँ है…

रोना चाहती हैं ये आँखें कि उनकी क़ुर्बत न यहाँ !
सूख गए आँसू सारे, नमी आँखों मे बाक़ी भी कहाँ है…

माना ग़िले किये तुमसे, पर ग़िलो में था बस प्यार बसा,
हाँ छोड़ आए हमें, कि तुमने रोका ही कहाँ है…

दूर हूँ मजबूर हूँ फ़िर भी ये रिश्ता क्यों जुड़ा है !
गलत नही ये बात तो फिर सही-भी कहाँ है…

देह को बाकी जो चंद सांसे उन्हें सुकूँ ही कहाँ है !
तेरी यादों से मेरी सांसो को बढ़ा सुकून मिला है

भर रही जिनकी याद में आहें,
न उसने देखा भी कहाँ है ??
न उसने देखा भी कहाँ है ??

4 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 04/12/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 04/12/2017
  3. Vikram jajbaati Vikram jajbaati 04/12/2017
  4. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 05/12/2017

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