बाल श्रमिक

चाँद सितारे छुने का मन करता है मेरा भी,

चार अक्षर पढ़कर बन सकते है हम गवैया भी।

फिर क्यों कोई कहता है मुझको,

छोटकू ,कलुआ, भलुआ भी।

रोज मै दुसरो की टेबुल चमकाता हूँ,

खेतो मे कुदाल चलाकर,

अन्न भी मैं उपजाता हूँ।

मेरी किस्मत कौन गढेगा ,

यह तो कोई नही बतलाता है।

शिखर, गुटका, गर्म चाय की बोली,

बस ट्रेन में रोज ही मैं लगाता हूँ।

मेरे नसीब में भोजन, दवा, नींद, पढाई नहीं,

मैं तो बस बाल श्रमिक कहलाता हूँ।

फिर भी अनपढ़ हो कर,

दस रूपये की तीन किताब से,

हर बच्चों को ज्ञान कराता हूँ।

8 Comments

  1. Abhishek Rajhans 03/12/2017
    • Bhawana Kumari Bhawana Kumari 07/12/2017
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 04/12/2017
    • Bhawana Kumari Bhawana Kumari 07/12/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/12/2017
    • Bhawana Kumari Bhawana Kumari 07/12/2017
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 04/12/2017
    • Bhawana Kumari Bhawana Kumari 07/12/2017

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