मैं प्यार नही कर सकता

समझ गया मैं भली भांति दुनिया के तौर तरीकों को
चोरो का पलड़ा भारी है मिलती राहत न सरीफों को

क्यों दिल लगाने से अक्सर दिल चूर चूर हो जाता है
कैसे कोई कर सकता ये तब ईमान कहां सो जाता है

हसरत प्यार की लेकर जो एक अंजानी राह चल देता है
बीते समय न देर लगी वो दुख फिर हर पल देता है

चाहत में प्रीतम के देखो उसने जो ख्वाबों को बोया था
अब पास नही उसके कुछ भी वो जी भर के अब रोया था

इक पराये को पाने में उसने अपनों का दांव लगाया था
किस मूर्ख जगत के प्राणी ने दिल मे ये ख्वाब जगाया था

देख ” मनु ” ये दुनिया कैसे दिल का खेल रचाती है
प्यार का भरोसा देकर के मृत्यु की सेज सजाती है

जो सीखी मैंने बात नयी इनकार नही कर सकता
मैं चाह कर भी अब किसी से प्यार नही कर सकता

 

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

11 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 23/11/2017
  2. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 23/11/2017
  3. Kajalsoni 24/11/2017
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 24/11/2017
  5. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/11/2017
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 27/11/2017

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