हमाई एक नई बुंदेलखंडी कविता

एक मौडी से हमें , खूबई हतो प्यार
लेकिन वा नई हती…,मिलवे को तैयार
वा वी करत-ती…,का जाने काय से डरत-ती
मिल गई एक दिना.., वा हमें बजार
ऊतई हमनें के दई, हमें खूबई है…तोसे प्यार
ऊकों पतो हतो के भैईया पीछो खडो़ हमार
केन लगी, हम इन चक्करों में नईया परत
एक घुमा के दओ सो, जैहो गिरत
ऊतई- के- ऊतई हमाई आशिकी धरी- की -धरी रे गई
वा आईती कछु केवे और कछु के गई
     “भागचंद अहिरवार निराला”

4 Comments

  1. Arun Kant Shukla Arun Kant Shukla 20/11/2017
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 20/11/2017
  3. Kajalsoni 20/11/2017
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/11/2017

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