हौसलों को पंख मिल गए – मनुराज वार्ष्णेय

आ गयी जो एक तितली , हौसलों को पंख मिल गए
थी पड़ी जो बंजर जमीं , हर तरह के फूल खिल गए

इस जहां के लोगों ने , क्या क्या मुझसे लूटा है
दर्द काली रातों में , नैन दोनों मेरे छिल गए

हम तो दर्द से भरे , बुत बने यूँ बैठे थे
एक तेरी तबस्सुम से , तार तार मेरे हिल गए

मुस्कराती थी देख मुझे , मैं भी देख मुस्काता
फिर जो मैंने खोया था , चैन और मेरा दिल गए

जब वफ़ा की बात करता , चुप न जाने वो हो जाती
माँगे थे जो मैंने कभी , आज हर जवाब मिल गए

मयकशी से भी ज्यादा , मेरी राहों में दम था
हम नशे में तो थे ही , और न जाने कितने मिल गए

क्या तजुर्बा मेरा रहा , थी अनोखी मेरी कहानी
जो मैं चाहता न मिला , जो न चाहता वो मिल गए

 

कवि – मनुराज वार्ष्णेय

6 Comments

  1. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 16/11/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 18/11/2017
  3. Kajalsoni 19/11/2017

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