इंसान हूँ

थकी आवाजें,आबरू बगल में,दकियानूसी का लिबास पहनता हूँ।
नफरत का व्यापार लगा,सौदा रूहानी कलपुर्जों का करता हूँ।।

बिखरी साँसे,खुद से अपरिचित,खबरेें जुबां पे परिंदों की रखता हूँ।
इस ज़हान की नुक्ताचीनी और बातें चाँद पे बस्ती बसाने की करता हूँ।।

लाज का घूँघट,इज्जत का नाड़ा,बन्द कमरे में ढीला बड़े नाज से करता हूँ।
जिस्म को तेरे,कपड़े पहनाकर, आबरू की ओट में,जज्बातों को तेरे नंगा रोज करता हूँ।।

फीका ज्ञान,साँझ का उल्लू, इमारतें जलाता शहर भर में फिरता हूँ।
सुलगाकर सिगार अरमानों का,कब्रिस्तान में मुर्दे आबाद करता हूँ।।

 

10 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 13/11/2017
    • Karma Vaahini Karma Vaahini 14/11/2017
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 14/11/2017
    • Karma Vaahini Karma Vaahini 14/11/2017
  3. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 14/11/2017
    • Karma Vaahini Karma Vaahini 14/11/2017
  4. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 14/11/2017
    • Karma Vaahini Karma Vaahini 14/11/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 15/11/2017
  6. Kajalsoni 19/11/2017

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