ऐसा है इन्सान

भौतिकता के लालच में करता कत्लेआम
ऐसा है भैया आज का इंसान
रिस्तो को जीता किस्तों में
दिन को सोता
रात को जागता
उल्लू बन गया इंसान
राह से अनजान
बनाता कैसी पहचान
ऐसा है भैया आज का इंसान
ज़िन्दगी के रंगमंच पे
बनकर नेता अभिनेता
नकली होती मुस्कान
कीमत तालियों की लगती
टके सेर में भाजी मिलती
टके सेर में खाजा मिलता
उसके घर की दीवारे भी साजिश करती
कमरे दर कमरे पे राज परत दर परत दफ़न रहती
स्वार्थ के बंधन में जकडा रहता
खून का रंग है लाल सही
गिरगिट बन गया इंसान
ऐसा है भैया आज का इंसान—अभिषेक राजहंस

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 03/11/2017
  2. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 04/11/2017
  3. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 04/11/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 04/11/2017

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