अब नहीं रहा

 

कभी दिल था
अब नहीं रहा,
बाइपास हो गया,
भाव-अभाव खत्म हो गए।
डल गया प्रैक्टिकल स्टंट,
नहीं महसूस होता कुछ भी,
एक लड़का रहा करता था सक के उस पार,
क्रता इंतज़ार पहल दुपहरे,
अब वहां नहीं रहता।
एक भिखारी रोज मिला करता था,
वहां जहां लोग होते,
दुआएं दिया करता था,
अब वह नहीं रहता वहां।
एक चिट्ठी लिखी जाती थी,
रात बिरात उठ कर,
अब चिटठी का सिलसिला भी उठा रहा गया,
नहीं रहा वो पता
जहां पोस्ट करने के लिए भागा करता था डाकघर।
एक आवाज़ था
हमेशा पुकारा करती थी,
अब उस आवाज़ में खनक नहीं रही,
ख़ामोश पुकार गले में घू घू करती,
दूर चली गई।
एक आदमी था,
ठीक चौराहे के पास तीसरी गली के चौथे मकान में
अब वो वहां नहीं रहता,
सुना है,
किराए नहीं दे पाता था,
निकाल दिया गया।
कभी बेरोजगारी में था वहां
बेरोजगारी लंबी खींची,
खींच गई दूरियां बाप के दिल में।
एक कवि हुआ करता था,
अब वो कविताएं नहीं करता,
लोगों ने खूब खरी खोटी सुनाई,
कमाई ढले की
करोगी कविताई,
अब वो कवि नहीं रहा।
एक बात पसरी थी
दोनों के बीच-
भाव की परतें भी खुलीं
करीब भी हुए,
लेकिन अब वो न बात रही और न भाव उनके बीच।

 

5 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 03/11/2017
  2. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 03/11/2017
  3. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 04/11/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 04/11/2017
  5. kaushlendra 15/11/2017

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