* संस्कृति और सभ्यता *

* संस्कृति-सभ्यता *
संस्कृति मिट रही सभ्यता बढ़ रहा
मानवता छोड़ मशीनियत गढ़ रहा,

भाईं भाईचारा का हुआ बट्टाधार
चेहरे पर मुस्कान दिल में तलवार,

घर-मकान के स्थान पर भवन बन रहा
अब इनसान कंकरीट में ढ़ल रहा,

फ़र्श दिवाल की चिकनाहट बढ़ रही
दिल में कड़वाहट बढ़ रही,

बड़ पीपल पाकड़ गमले में आ रहें
तुलसी गेंदा को पछाड़ मनीप्लानट नागफनी छा रहें,

ध्यान आराधना सब पिछे छूट रहा
दिखावा के चककर में शान्ति लुट रहा,

आज मान सम्मान प्रतिष्ठा का पैमाना बदल रहा
धन समपदा सभी को दीवाना बना रहा ,

संस्कृति मिट रही सभ्यता बढ़ रहा
मानवता छोड़ मशीनियत गढ़ रहा।
नरेन्द्र ये दुनिया रोज एक कहानी गढ़ रहा।

2 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 02/11/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 03/11/2017

Leave a Reply