कवि और कविता – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

कौन कहता है
मैं कवि हूँ
कभी था
आज आदमी हूँ।
जी तोड़ मेहनत की थी
बहुत कुछ सीखा था
बहुत कुछ परखी भी थी
कवि बनने के लिए
अपनी सोच तक बदली थी
पर कवि नहीं बन पाया
खुदा खैर करे
आज आदमी हूँ
जिंदा लाश की तरह जीना
कोई जीना नहीं
कवि के सारे गुण
मेरे अंदर साक्षात है
देखने पर पता नहीं चलता
चलती है तो
वह मेरी कलम
जो अपने आप गढ़ लेती है
कविता – गजल – नज्में – गीत
अपने आप मन बोलता है
कलम दौड़ पडती है
कभी रुक – रुक कर चलती थी
तब मैं कवि था
आज आदमी हूँ।
पता नहीं
बिन लगाम घोड़े की तरह
रफ्तार पकड़ लेती है
मेरी जुबान नहीं चलती
पर खूब दौड़ लेता हूँ
किसी चीज को जल्दी पकड़ लेता हूँ
कौन कहता है
मैं कवि हूं
कभी था
आज आदमी हूँ।

7 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 29/10/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 29/10/2017
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 30/10/2017
  4. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 30/10/2017
  5. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 30/10/2017
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 30/10/2017
  7. ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 30/10/2017

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