गीता

हैं कितने कल्प व्यतीत हुए

है कितना समय गया बीता

जग है पलट गया लेकिन

न हुई पुरातन यह गीता

जिस भाव के सांचे में ढालो

गीता है उसमे ढल जाती

इस कारण न यह पुरानी थी

न है अब, न यह  हो सकती

जब पाप कभी बढ़ जाते हैं

गीता पापों को दलती है

विष्णु-नाभि के जलज भांति

यह जन-अंतस में पलती है

मनो यदि गीता गागर है

भावों का इसमें सागर है

इसके दिव्य विवेक भानु से

सारा विश्व उजागर है

लघु सरिता के समान चंचल

मानव का चित्त विहंगम है

स्थिर-प्रज्ञ कहाता जब होता

गीता-समुद्र से संगम है

जब-जब संदेहों के बादल

हैं ज्ञान-भानु को ढक लेते

तब गीता-भाव पवन बन कर

उन्हें उड़ा है ले जाते

यह गीता है संपर्क -सेतु

ह्रदय से ह्रदय मिलाती है

जान-जान मत सदा समन्वित कर

उनमें क्या मेल दिखाती है

यह पाप धरा के धोती है

जन-जन के ह्रदय पिरोती है

सत्य-अहिंसा के बीजों को

जग-उपवन में बोती है

आओ इन भावों पर चल-कर

हम नव-युग का आह्वान करें

आओ बंधु-भाव की प्रेरक

गीता अनुसंधान करें

7 Comments

  1. Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' Dr SUSHIL UPADHYAY 'VIMAL' 26/10/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 27/10/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 27/10/2017
  4. C.M. Sharma C.M. Sharma 27/10/2017
  5. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 27/10/2017
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 27/10/2017
  7. ANU MAHESHWARI Anu Maheshwari 27/10/2017

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