शहर से बाहर


शोर में डूबा शहर,
कभी शोर शहर में
तो कभी शहर में शोर।
अंदर भीतर शोर
शोर से भरा मन,
बेचैन ढूंढ़ता रहा सकून के पल,
शहर भर में शोर ही शोर,
खुल गया शहर में मॉल।
सेल ही सेल का शोर,
भागते बखोरन चाचा,
घुरनी की माई,
मॉल्स में ठंढ़ी हवा के साथ,
शोर फेफड़ां में भरती।
शहर के बाहर
उस सिवान में
अब नहीं बैठते,
चचा रिज़वी,
खखार कर गरियाते रहते,
स्ुनता नहीं कोई।
शहर के बाहर कुहरा घना था,
सड़कें सरपट भाग रही थीं,
शहर की ओर,
साएं साएं करती गाड़ियां,
टूटी सड़कों पर
हिचकोले खाती,
गुम हो जाती
शोर में।
कभी शहर में शोर
कभी मन में शोर,
जिधर भी सांस लो
सांस भरते शोर अंदर बैठ जाता,
सब गड़मड़
शोर मुझमें था,
या मैं शोर में।

6 Comments

  1. Ram Gopal Sankhla Ram Gopal Sankhla 26/10/2017
  2. kprapanna 27/10/2017
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 27/10/2017
  4. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 27/10/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 27/10/2017
  6. kaushlendra 01/11/2017

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