काला राक्षस-4

घर्र घर्र घूमता है पहिया

गुबार

उठ रही है अंधकार में

पीली-आसमानी

उठ रही है पीड़ा-आस्था भी
गड्डमड्ड आवाजों के बुलबुलों में

फटता फूटता फोड़ा

काल की देह पर

अंधेरा है

और काले सम्मोहन में मूर्छित विश्व
फिर एक फूँक में

सब व्यापार …

देह जीवन प्यार

आक्रामक हिंसक

जंगलों में चौपालों में

शहर में बाज़ारों में

मेरी साँसों में

लिप्सित भोग का

काला राक्षस

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