क्यूँ सोचूँ -प्रशान्त तिवारी

क्यूँ शांत रहा इतने दिन मैं
इतना भी ऐसा विचरना क्या था ,
टाल दिया होता मत को
पतझढ़ में बात बिगड़ना ही था।
जो बोल रहे वो बोलेंगे
क्या सोच रहे ये क्यूँ सोचूँ!
जब खुद ही पार उतरना है तो
घुट-घुट के फिर क्यूँ सोचूँ!

अभी सफर तो शुरु हुआ है
दूर शिखर पर जाना होगा,
जाने कितने व्यवधान पड़ेंगे
कटु वाच्य, व्यंग को सहना होगा।
उस पार मिलेगी मंजिल जब
इस पार की बातें क्यूँ सोचूँ!
जब खुद ही पार उतरना है तो
घुट-घुट के फिर क्यूँ सोचूँ!

तेरी आशाएँ मेरे मन में
गोतें खूब लगाती हैं,
दक्षिण ध्रुव पर भी उमीद की
बौछारें रह-रह आती हैं।
जब तार बँधे तो सपनों को
बोझ बनाकर क्यूँ सोचूँ!
जब खुद ही पार उतरना है तो
घुट-घुट के फिर क्यूँ सोचूँ!

आसमान में तारों के संग
दिन-रात मैं उलझा रहता हूँ,
विस्फोट न हो जाए कपाल में
हर अड़चन को सहता हूँ।
अपने मस्तिष्क के हर पुर्जों को
चीर-चीरकर क्यूँ सोचूँ!
जब खुद ही पार उतरना है तो
घुट-घुट के फिर क्यूँ सोचूँ!

6 Comments

  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 20/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी प्रशान्त तिवारी 21/10/2017
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 21/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी प्रशान्त तिवारी 21/10/2017
  3. Madhu tiwari Madhu tiwari 21/10/2017
    • प्रशान्त तिवारी प्रशान्त तिवारी 21/10/2017