एक ही प्रेम न जाने कितनी बार

एक ही प्रेम न जाने कितनी बार कितने विभिन्न रुपों में,
तेरे से कब, क्यूँ, कैसे हुआ- यह भी स्मरण नहीं।
कब प्राण गीतों के सरगम
मेरे मुँख से निकले और तू उन्हें देख-देख कर मुस्काया।
जानता हूँ, यह संसार मुझे विश्वासघात करता है,
पत्ति, नदी, बादल, सावली स्नेह की कोमल धूप तेरे मधुर हाथों को स्पर्श करते हैं।
यह बात चित्त की परम उत्सुक्ता है।
मेरे जीवन का आखिरी गन्तव्य झर-झर बहे जा रहें।
एक ही तेरा रूप न जाने कितने रूपों में आभास हुआ,
बूस तू ही है चारो ओर, विश्व की शून्यता और महाशांति है।
आज के बाद, अगली सुबह हो न हो कौन जाने,
किंतु वह अंत तेरी छाँव में होती है,
याह ज्ञात है उसे और तुझे भी।

2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 20/10/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 21/10/2017

Leave a Reply to Madhu tiwari Cancel reply