अफरोज-ए-आफताब है तेरी काया!

लव तेरे अमृत के प्याले
नैन तेरे हैं मधुशाले

बात तुम्हारी मीठी मीठी
जैसे मधु के रस टपके

हंसी तुम्हारी गुलज़ारो सी
गुलमोहर सी रंग बरसे

बाल तुम्हारे काले बादल
छा जाये तो जिया मचले

स्वप्न तुम्हारी जब जब आये
स्वप्न स्वर्ग सा लगने लगे

मुखरा तेरा चाँद का टुकरा
चाँद छूने को दिल मचले

तेरी नज़र को नाजार तरसे
जब जब राह मे तु निकले

अफरोज-ए-आफताब है तेरी काया
आफताब भी झूक जाए

शबाब बसा आवाज मे तेरे
सुनने को मेरा मन तरसे

चले जब तु कलि बोल उठे
तु लगे है मुझको परि जैसे

गंगोत्री सी है काया तेरी
नहला के मुझपे करम कर दे…..!

8 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 15/10/2017
    • sanjeevssj sanjeevssj 16/10/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 16/10/2017
    • sanjeevssj sanjeevssj 16/10/2017
  3. sanjeevssj sanjeevssj 16/10/2017
  4. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 16/10/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 17/10/2017

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